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28 MAY 2012- JAIPUR UDYOG MAIDAN LIVE - 2 - NEWS PAPER KHABRKOSH (27 MAY 2012 )


कहीं गहलोत और कांग्रेस को न ले डूबे आरसीएम प्रकरण ?




यूं किस तरह कटेगा कड़ी धूप का सफर,
सर पर ख्याले यार की चादर ही लिये चलो।
इस चिलचिलाती धूप और धूलभरी आंधियों के बीच पिछले 20 दिनों से जोशीले नारे लगा रहे लोगों के सिर पर आरसीएम नामक ख्याल की चादर है, जिसकी याद में, अच्छे की उम्मीद में उनका कड़ी धूप का सफर जयपुर के उधोग मैदान में जारी है।
आरसीएम मतलब राइट कंसेप्ट मार्केटिंग बिजनेस, भीलवाड़ा की कम्पनी फैशन सूटिंग्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा विगत 11 वर्षों से संचालित किया जा रहा था। यह प्रत्यक्ष विक्रय प्रणाली पर आधारित बहुस्तरीय व्यवसायिक व्यापार है जो भारत में नर्इ आर्थिक नीतियों के साथ पशिचम से आया और बहुत जल्दी ही देशभर में फैल गया, आज अनुमान है कि भारत में एमएलएम कम्पनियों का कारोबार 100 अरब रुपए का आंकड़ा पार कर गया है, एक मोटे अंदाज के मुताबिक वर्ष 2020 तक इस व्यापार प्रणाली से 50 करोड़ लोगों को रोजगार हासिल होने की संभावना है।
एक तरफ पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था खतरे के निशान पर बह रही है, अमेरिका जैसा सम्पन्न देश अर्थ संकट से जूझ रहा है, विश्वभर की औधोगिक इकार्इयों से मजदूरों और कर्मचारियों की छंटनी हो रही है, बेरोजगारी भयावहता का स्तर पार कर चुकी है, जिसके चलते मानव जाति का आर्थिक सामाजिक संतुलन गड़बड़ा रहा है। समाज में आर्थिक अपराधों में वृद्धि दर्ज की जा रही है, ऐसे में भारत जैसे विकासशील देश का आर्थिक महाशकित बनने का स्वप्न तभी सार्थक हो सकता है जब हम स्वावलम्बी और आत्म निर्भर होने पर जोर दे सके।
इस दिशा में भीलवाड़ा की आरसीएम बिजनेस ने काफी महत्वपूर्ण नवाचार किये तथा अपने 800 उत्पादों, तकरीबन 8 हजार वितरण केेंद्रों और 1 करोड़ 31 लाख उपभोक्ताओं के जरिये देश में एक नये किस्म का आर्थिक लोकतंत्र स्थापित करने में अहम भूमिका निभार्इ। क्योंकि केवल संवैधानिक, सामाजिक व राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अधूरा ही है जब तक कि देश में आर्थिक संसाधनों तक सबकी समान पहुंच नहीं बन जाये।
सदियों से इस देश में जाति और वर्ण आधारित व्यवस्था के चलते व्यापार वाणिज्य वैश्यवर्णीय कुछ समुदायों तक ही सीमित रहा आजादी के बाद तक भी सेठ, लाला और साहूकारों की वही घिसी पिटी पारम्परिक व्यवस्था चलती रही जो शोषण और जमाखोरी तथा घटिया उत्पादन व मिलावट के खंभों पर टिकी हुर्इ थी। वक्त ने करवट ली। वैशिवक स्तर पर व्यवसाय के लिये विभिन्न देशों के दरवाजे खोले गये, भारत ने भी सन 1990-91 में उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और निजीकरण की नर्इ अर्थ नीति को अपनाया तथा विश्व बाजार की प्रतिस्पर्धा में स्वयं को खड़ा किया, आशा की गर्इ कि नर्इ आर्थिक नीतियों के चलते कोर्इ भी बिजनेस करने तक आमजन की भी पहुंच होगी, इंस्पेक्टर राज खत्म होगा, लाला राज खत्म होगा और आम से आम आदमी जिसे जनसाधारण कहा गया है वह भी व्यापार वाणिज्य में भागीदारी कर पायेगा।
यह माना जा सकता है कि प्रत्यक्ष विक्रय प्रणाली इस मुल्क के ‘लाला राज और ‘इंस्पेक्टर राज को खत्म करने में बहुत कामयाब हुर्इ, क्योंकि उसमें उत्पाद की सर्वोच्च गुणवत्ता ही सर्वोपरि चीज मानी गर्इ तथा कहा गया कि ऐसा व्यवसाय जिसमें न निवेश की जरूरत और न ही फैक्ट्री की, दफ्तर भी नहीं चाहिये, कोर्इ झंझट नहीं, भागीदारी करो और आय प्राप्त करो, मतलब कि बिना निवेश की साझेदारी ! इस पद्धति ने बेरोजगार होती युवा पीढ़ी को आकर्षित किया, वहीं विज्ञापनों से लुटे-पिटे उपभोक्ताओं को भी लुभाया क्योंकि स्थापित व्यापारिक पद्धतियों में बड़ा हिस्सा विज्ञापन तथा विक्रय वितरण की पुरातन श्रृखंला के पास रह जाता था, ग्राहक को किसी किस्म का केार्इ लाभ नहीं होता, उपभोक्ता पारम्परिक व्यापार प्रणाली में सर्वाधिक शोषित होता है, फिर जागो ग्राहक जागों जैसे पाखण्ड करने पड़ते है मगर एमएलएम में ग्राहक ही वह धुरी है, जिसे सीधे फायदा मिलता रहता है। बेशक इस प्रणाली में कर्इ किस्म की खामियां हो सकती है साथ ही बड़ी संख्या में फर्जी कम्पनियों का दखल भी इसमें बढ़ा है, फलत: रियल एमएलएम और चिटफण्ड कम्पनियों के बीच का फर्क कर पाना ही मुशिकल हो गया है। उसी का नतीजा आज आरसीएम के करोड़ो डिस्ट्रीब्यूटर्स भुगत रहे है।
देश को आर्थिक महाशकित बनाने की दिशा में स्वदेशी प्रयासों के तहत इस सदी का सबसे बड़ा प्रयोग आरसीएम के नाम पर भीलवाड़ा में प्रारम्भ हुआ तथा 11 वर्षों तक सुचारू रूप से जारी रहा, इस दौरान इस कम्पनी ने लाखों लोगों की जिन्दगीयां तो बदली ही, अर्थ संकट झेल रही सरकारों को भी सैकड़ों करोड़ रूपए का राजस्व देकर उन्हें भी मजबूत किया जो कि अपने आप में एक सराहनीय प्रयास कहा जा सकता है।
सत्तारूढ़ दल के नेताओं के दागदार इतिहास के प्रकटीकरण, स्थानीय भूमाफिया और सत्तासीनों के अपवित्र गठजोड़, दिल्ली में उच्च स्तर पर रिटेल में एफडीआर्इ लाने का फैसला तथा राजस्थान कांग्रेस में अशोक गहलोत व सी.सी. जोशी के मध्य चल रहे सत्ता संघर्ष के बीच आरसीएम को बलि का बकरा बनना पड़ा।
यह दुनिया का आठवां अजूबा है कि बिना किसी व्यकित की शिकायत के एक मुखबिर से प्राप्त जानकारी के आधार पर पुलिसिया डण्डे के बल पर आरसीएम को 9 दिसम्बर 2011 को जबरदस्ती बंद करवा दिया, तब सत्ताधारी नेताओं, पुलिस व प्रशासन के लोगों का तर्क यह था कि राजस्थान में मल्टी लेवल मार्केटिंग कम्पनियों के विरूद्ध चलाये जा रहे जांच अभियान के चलते आरसीएम पर भी कार्यवाही की गर्इ है, जल्दी ही सब कुछ ठीक हो जायेगा, लेकिन आज पांच माह बीत जाने पर भी कुछ भी ठीक होता प्रतीत नही हो रहा है, इससे यह शक पुख्ता हो जाता है कि यह पुलिस ने गोल्डसुख में फंसी अपने आला अफसरान की बीबियों के फ्राड को ढंकने और खुद की खाल बचाने के उíेश्य से एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत किया है, अगर ऐसा नहीं होता तो गोल्डसुख फ्राड के उजागर होने के 6 माह पहले ही भीलवाड़ा की फिजां में आरसीएम पर शिकंजा कसने सम्बन्धी तैयारियों की सूचनाएं कैसे तैरने लगी थी ? यह महज संयोग नहीं हो सकता है कि उच्च स्तर पर ये निर्देश दिये गये कि सभी विभागों को सक्रिय किया जाये कि वे आरसीएम की गलतियां पकड़े क्योंकि सरकार उसके विरूद्ध एक बड़ा आपरेशन करना चाहती है। अन्तत: सरकार ने वह कर दिखाया, यह किन लोगों के निर्देश पर हुआ, इस सुनियोजित आपरेशन में कौन-कौन शामिल थे, किन अधिकारियों को इसकी जिम्मेदारी दी गर्इ और किनको उसे करने का क्या पुरस्कार मिला, यह बातें अब जगजाहिर है, जो भी स्थानीय राजनीति और सत्ता केंद्रों के बारे में जानते है, वे इसे अच्छी तरह समझ चुके है, जल्दी ही आरसीएम पर हुर्इ कार्यवाही के सच को दस्तावेजी सबूतों के साथ हम भी उजागर करेंगे।
खैर, अभी चर्चा उन जाबांज योद्धाओं की, जो सत्य की जंग को इस जानलेवा गर्मी में भी लड़ रहे है। जयपुर के ऐतिहासिक स्टेच्यू सर्कल पर कर्इ सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष व आन्दोलन हुये है और होते रहेंगे, मगर यह पहला आर्थिक व्यापारिक जन आन्दोलन है जिसमें इंकलाब जिन्दाबाद के नारे साफ सुने जा सकते है।  आरसीएम उपभोक्ता एंव वितरक कल्याण समिति के मीडिया प्रभारी अवधेश सिंह एवं रामशंकर सिंह के मुताबिक संघर्षरत आरसीएम के उपभोक्ताओं की बैचेनी बढ़ रही है क्योंकि सरकार उनकी शांतिपूर्ण व अहिंसात्मक भाषा को नहीं समझकर यह संदेश दे रही है कि सरकारें केवल ‘पटरी उखाड़ने वालों की उग्रता की भाषा ही समझती है। उनके अनुसार राजस्थान की राजधानी जयपुर के उधोग मैदान में बेहद शांतिपूर्ण ढंग से 20 दिन से धरने पर बैठे आरसीएम उपभोक्ताओं के धैर्य का बांध कभी भी टूट सकता है। सरकार के टालमटोल व ढुलमुल रवैये से देश भर के लाखों उपभोक्ताओं को आक्रोश से भर दिया है। सरकारी के असहिष्णु रवैये के कारण मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की छवि पर भी जबरदस्त असर पड़ रहा है, देश भर का सोशल मीडिया उन्हें एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित कर रहा है। जो रोजगार छीनने व सरकार को सालाना 125 करोड़ रुपये की राजस्व हानि पहुंचाने के लिये जाना जायेगा। इतना ही नहीं बलिक इस पूरे आंदोलन से कांग्रेस व उसके घटक दलों पर भी बुरा असर होने की संभावना बन गर्इ है, कहा जा रहा है कि पूरे देश में सीधे तौर पर आरसीएम से 1 करोड़ 31 लाख जुड़े हुए है तथा तकरीबन 10 करोड लोगों तक आरसीएम किसी न किसी रूप में अपनी पहुंच रखता है, ऐसे में उसके विरूद्ध की गर्इ नाजायज कार्यवाही व सरकार के तानाशाहीपूर्ण असंवेदनशील व्यवहार के चलते इसका खामियाजा आने वाले चुनाव में कांग्रेस तथा यूपीए को उठाना पड़ सकता है, केंद्र में शामिल संप्रग के घटक दलों के कर्इ सांसदों ने प्रधानमंत्री कार्यालय को इस खतरें से अवगत कराते हुए आशंका जतार्इ है कि कहीं सरकार के लिये यह आत्मघाती न साबित हो।
अपने ही विधायकों की बगावत और अल्पसंख्यकों व महिलाओं तथा वंचित वर्गों पर बढ़ रहे अत्याचारों के कारण अच्छे खासे बदनाम होते जा रहे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर आरसीएम पर की जा रही कार्यवाही की गेंद केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री सी.पी. जोशी द्वारा फैंकी जाने का भी कर्इ लोग राजनीतिक अर्थ निकाल रहे है क्योंकि शुरूआती दौर में मीडिया और जानकारों का मानना था कि आरसीएम के विरूद्ध की गर्इ कार्यवाही में एक केंद्रीय मंत्री (डा. सी.पी. जोशी) का हाथ है मगर अब राज्य सरकार द्वारा अपनाये जा रहे रवैये, धरने के प्रति उदासीनता और गार्इड लार्इन बनाने को लेकर की जा रही अनावश्यक देरी ने इस गेंद को वापस गहलोत के पाले में फैंक दिया है, राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि ऐसा करके डा. सी.पी. जोशी व उनके लोगों ने गहलोत को एक राष्ट्रव्यापी बदनामी की ओर धकेलने में सफलता हासिल कर ली है।
आरसीएम का आन्दोलन धीरे-धीरे गरम तेवर वाला होता जा रहा है, राज्य सरकार और मुख्यमंत्री गहलोत के प्रति आन्दोलनकारियों की तल्खी बढ़ती जा रही है, मंच पर अब कड़े शब्द इस्तेमाल किये जा रहे है, यहां तक कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के विधानसभा क्षेत्र जोधपुर से बड़ी संख्या में आए आरसीएम उपभोक्ताओं ने गहलोत के खिलाफ जबरदस्त नारेबाजी की एवं अगले चुनाव में कांग्रेस का सफाया करने का संकल्प भी लिया।
इस से भी आगे बढ़कर आरसीएम उपभोक्ताओं का संघर्ष अब खूनी संघर्ष का रूख अख्तियार कर रहा है, हालांकि वे हथियार नहीं उठा रहे है मगर सैकडों उपभोक्ताओं ने अपने खून से गहलोत को पोस्टकार्ड लिखकर मुख्यमंत्री कार्यालय को पोस्ट कर दिये है। इनका कहना है कि यह इंसानों का लहू है, यह लहू गहलोत के कठोर दिल को पिघला पाता है या नहीं ? इससे पहले भी मध्यप्रदेश के एक आरसीएम वितरक नवीन साहू द्वारा कम्पनी बंद होने से हुर्इ आर्थिक तंगी व भुखमरी के हालात के चलते आत्महत्या कर ली थी, जिसकी मौत के बोझ तले भी गहलोत सरकार दबी हुर्इ है।
राजस्थान की गहलोत सरकार को अब अन्य राजनीतिक दलों से भी इसके लिये आलोचना सहन करनी पड़ रही है। प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्री नारायण सामी से मिली कड़ी फटकार के बाद राजस्थान सरकार ने आरसीएम उपभोक्ता एंव वितरक कल्याण समिति के प्रतिनिधियों को बुलाकर बात की तथा शीघ्र ही एमएलएम के लिये गार्इड लाइन बनाने के लिए उन्हें आश्वस्त किया, इस बाबत काफी काम भी हुआ है, गृह सचिव अशोक संपतराम के पास अभी यह मामला लमिबत है, बताया तो यह जा रहा है कि उन्होंने एक ड्राफ्ट गार्र्इड लाइन विधि मंत्रालय को भेजी है, वहां से परीक्षण व मार्गदर्शन के बाद राज्य सरकार इस पर फैसला करेगी लेकिन सरकार की मंथर गति इन आरसीएम वितरकों को सुहा नहीं रही है, वे जल्द ही कोर्इ फैसला चाहते है।
उनके आन्दोलन पर मुख्य विपक्षी दल भाजपा एकदम चुप है, इस पर आरसीएम के उपभोक्ताओ को घोर आश्चर्य हो रहा है कि विपक्ष कैसे इस मामले में सत्ता पक्ष का पिछलग्गू हो गया है, मगर राजस्थान के कुछ मुखर विधायकों ने इस पर खुलकर अपनी राय जाहिर करके जता दिया है कि अगर इस मसले का शीघ्र ही हल नहीं निकाला गया तो गहलोत के लिये यह गले की हडडी भी बन सकता है।
माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक कामरेड अमराराम, राजस्थान राजपूत समाज के अध्यक्ष गिरीराज सिंह, कांग्रेस विधायक प्रताप सिंह खाचरियावास, निर्दलीय विधायक रणवीर पहलवान तथा राजस्थान प्रदेश सीटू के अध्यक्ष रामपाल सैनी तथा केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल इत्यादि ने खुलकर आरसीएम उपभोक्ताओं के आन्दोलन का समर्थन करके इस प्रकरण के राजनीतिक निहितार्थों की तरफ साफ र्इशारा कर दिया है। अब भी अशोक गहलोत नहीं समझे तो यह उनके राजनीतिक जीवन की बहुत बड़ी भूल ही होगी।
कुमार मंयक
(लेखक से kumarmayank590@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।)

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